प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ गया है, खर्च कम से कम हो गया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, उत्पादन का आकार बढ़ रहा है, वह हर साल साइज बढ़ रहा है
कर्जबाजारी विरुद्ध करोड़पति. १) एक जमाना था, अंगूर के बगीचेवाला किसान भाई सबसे समृद्ध किसान भाई कहलाता था, आप उन स्मृति चिन्हों को आज भी नाशिक जिले के अंगूर की खेतीवाले क्षेत्र में देख सकते हैं, किसान भाइयों के बंगले जो खेतों में बने हैं, उनकी कीमत करोड़ों रुपये है, यह समृद्धि अब गायब हो चुकी है, अब वो करोड़ों के बंगलेवाले किसान भाई कर्जबाजारी बन चुके हैं. २) इसका कारण अंगूर अब कम पैदा हो रहा है या बाजार भाव नहीं मिल रहा ऐसा नहीं है, अंगूर के खेतों में इतनी ज्यादा मात्रा में रासायनिक खाद तथा जहरीली दवा डाली गई है कि, प्रकृति के द्वारा पोषण की व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है. ३) मिटटी में रसायन की मात्रा बढ़ जाने से तथा सूक्ष्म जीवाणु की संख्या कम से कम हो जाने से हानिकारक विषाणुओं की संख्या प्रचंड मात्रा में बढ़ गई है, प्रकृति की विनामूल्य भोजन प्रणाली से भोजन मिलना तक़रीबन बंद सा हो गया है, किसान भाई जितना डालता है, विषाणु उस भोजन की चोरी करके अपनी संख्या बढ़ रहे हैं. ४) भोजन की कमी के आभाव में फसलें कमजोर बनकर किड तथा रोगों से ग्रस्त बन रही हैं, कंपनीवाले इसका फायदा उठा रहे हैं, हजारों रुपये लीटर की दवाओं का छिड़काव बतानेवाले डॉक्टरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, किसान भाई जितने रुपये का अंगूर बेचता है तक़रीबन उतना ही रूपया उस अंगूर को पैदा करने में खर्च कर रहा है. ५) आप अंगूर के जो फोटो देख रहे हैं, यह खेत है नितिन डोखले साहब का ग्राम खेड़गांव तहसील दिंड़ोरी जिला नाशिक में, इनके पास ४० एकड़ अंगूर की बाग़ है, रासायनिक खाद तथा दवाओं के इतने जानकार हैं कि, परिसर के किसान भाई इनके पास जानकारी लेने आते हैं, रसायन की भरमार के कारण इनकी भी खेती लगभग नुकसान में चल रही थी. ६) लगभग ३ साल पहले इनकी मुलाकात कृष्ना एग्री सायन्स प्रायवेट लिमिटेड के नाशिक तथा अहमदनगर जिले के मैनेजर राजेंद्र कोल्हे साहब से हुई, उन्होंने कंपनी के कुछ उत्पादनों का इस्तेमाल किया, उनको बहोत अच्छे रिझल्ट मिले, डोखले साहब समझ चुके थे कि, समय रहते रसायन को बाय-बाय नहीं किया तो मिटटी बाय-बाय कर देगी. ७) डोखले साहब ने दूसरे वर्ष एक बड़ा निर्णय ले लिया कि, आज से खेतों में रासायनिक खाद का एक दाना भी नहीं डालेंगे, कंपनी को जब पता चला काफी देर हो चुकी थी अन्यथा कंपनी ने यही सुझाव दिया होता कि रासायनिक खाद धीरे-धीरे बंद करो, परिणाम उत्साह वर्धक आया, डोखले साहब ने हिसाब करके बताया की इस साल रासायनिक बंद करके कितने पैसे कमाए, जहरीली दवाओं की खरीदी से मुक्ति मिली और उत्पादन बढ़कर मिला. ८) अंगूर के बगीचेवाले किसान भाई हर दिन एक दवा का छिड़काव करने में विश्वास करते हैं, कभी-कभी सुबह एक दवा शाम को दूसरी दवा का भी छिड़काव करने में पीछे नहीं रहते, राजेंद्र कोल्हे साहब, बाग़ में पहले दिन से कृष्ना एग्री सायन्स प्रायवेट लिमिटेड की सभी प्रकार के किड रोगों की एक दवा आल क्लियर का इस्तेमाल करवा रहे थे. ९) अंगूर का किसान भाई जिस बीमारी से सबसे ज्यादा डरता है, उसका नाम है, डाउनी मिल्ड्यू, जिस खेत में आल क्लियर का इस्तेमाल होता है, वहां डाउनी की चिंता समाप्त हो जाती है, पावडरी मिल्ड्यू भी नहीं आता, अंगूर की खेती में कृष्ना एग्री सायन्स प्रायवेट लिमिटेड के उत्पादनों का इस्तेमाल प्रारम्भ करते ही डोखले साहब के खेत से सारी समस्या दूर भागने लगी. १०) अब प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ गया है, खर्च कम से कम हो गया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, उत्पादन का आकार बढ़ रहा है, वह हर साल साइज बढ़ रहा है, इस साल आप जो फोटो देख रहे हैं, ये 24MM का साइज है, किसान भाई का कहना है कि, माल हार्वेस्टिंग होने तक यह साइज बढ़कर 28MM तक बन जाएगा. ११) पर्पल वेरायटी में 22MM तक साइज मिलता है, यहाँ साइज 28MM बनने के कारण भाव ऊँचा मिलेगा, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि, अंगूर खाने में स्वादिष्ट तथा मीठा है, आर्गनिक उत्पादनों के इस्तेमाल के कारण मिठास ज्यादा है, इसके कारण भी भाव अच्छा मिलेगा
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